मोहम्मद इक़बाल (1877–1938) सियालकोट में पैदा हुए। उन्होंने लाहौर, कैम्ब्रिज और म्यूनिख में पढ़ाई की। शुरुआत में उन्होंने दाग़ देहलवी को अपनी ग़ज़लें दिखाईं।
अल्लामा इक़बाल का परिचय
- समय: 1877–1938
- जगह: सियालकोट / लाहौर
इक़बाल ने उर्दू और फ़ारसी दोनों में लिखा। 'सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा' (तराना-ए-हिंद) उन्हीं की रचना है। उनकी शायरी का केंद्र 'ख़ुदी' यानी इंसान का आत्मसम्मान और हौसला है। उनका इंतक़ाल लाहौर में हुआ।
इक़बाल की मशहूर शायरी, अर्थ सहित
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ: सितारों के आगे भी और दुनियाएँ हैं। रुकना नहीं, अभी और मंज़िलें और इम्तिहान बाक़ी हैं।
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ: ख़ुदी = आत्मसम्मान, रज़ा = मर्ज़ी। अपने आप को इतना ऊँचा उठाओ कि क़िस्मत लिखने से पहले ख़ुदा ख़ुद तुमसे तुम्हारी मर्ज़ी पूछे।
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ: पूरी दुनिया से अच्छा है हमारा हिंदुस्तान। हम इसकी बुलबुलें हैं और ये हमारा बाग़ है।
नहीं है ना-उमीद 'इक़बाल' अपनी किश्त-ए-वीराँ से
ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी
— अल्लामा इक़बाल
अर्थ: किश्त-ए-वीराँ = उजड़ा खेत, ज़रख़ेज़ = उपजाऊ। इक़बाल अपनी उजड़ी ज़मीन से निराश नहीं, थोड़ी नमी मिले तो ये मिट्टी बहुत उपजाऊ है।
नोट: ये रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं और शायर के नाम के साथ दी गई हैं। अर्थ हमारी टीम ने आसान भाषा में लिखे हैं।