शेख़ मोहम्मद इब्राहीम 'ज़ौक़' (1790–1854) दिल्ली के एक साधारण परिवार में पैदा हुए। अपनी शायरी के दम पर वो मुग़ल दरबार तक पहुँचे और बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद बने।
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ का परिचय
- समय: 1790–1854
- जगह: दिल्ली
उन्हें 'मलिक-उश-शुअरा' यानी राजकवि का ख़िताब मिला। ग़ालिब के साथ उनकी अदबी नोक-झोंक मशहूर है। ज़ौक़ की ज़बान साफ़ और मुहावरेदार है।
ज़ौक़ की मशहूर शायरी, अर्थ सहित
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे
मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे
— शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
अर्थ: परेशान होकर कहते हैं कि मर जाएँगे, पर अगर मरकर भी सुकून न मिला तो फिर कहाँ जाएँगे?
लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले
अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले
— शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
अर्थ: हयात = ज़िंदगी, क़ज़ा = मौत। ज़िंदगी ले आई तो आ गए, मौत ले चली तो चले गए। न आना अपनी मर्ज़ी से था, न जाना।
ऐ 'ज़ौक़' तकल्लुफ़ में है तकलीफ़ सरासर
आराम में है वो जो तकल्लुफ़ नहीं करता
— शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
अर्थ: तकल्लुफ़ = दिखावा/औपचारिकता। दिखावे में बस तकलीफ़ है। आराम से वही है जो बनावट नहीं करता।
नोट: ये रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं और शायर के नाम के साथ दी गई हैं। अर्थ हमारी टीम ने आसान भाषा में लिखे हैं।