हकीम मोमिन ख़ाँ 'मोमिन' (1800–1851) दिल्ली के रहने वाले थे। वो पेशे से हकीम थे और ज्योतिष, शतरंज और संगीत में भी माहिर थे।
मोमिन ख़ाँ मोमिन का परिचय
- समय: 1800–1851
- जगह: दिल्ली
ग़ालिब और ज़ौक़ के ज़माने में मोमिन अपनी नाज़ुक और रोमांटिक ग़ज़लों के लिए मशहूर थे। एक मशहूर क़िस्सा है कि उनके शेर 'तुम मिरे पास होते हो गोया' पर ग़ालिब ने कहा था कि इसके बदले वो अपना पूरा दीवान दे सकते हैं।
मोमिन की मशहूर शायरी, अर्थ सहित
तुम मिरे पास होते हो गोया
जब कोई दूसरा नहीं होता
— मोमिन ख़ाँ मोमिन
अर्थ: गोया = मानो। जब मैं अकेला होता हूँ, तब लगता है जैसे तुम मेरे पास हो। तन्हाई में तुम्हारी याद साथ रहती है।
उम्र तो सारी कटी इश्क़-ए-बुताँ में 'मोमिन'
आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे
— मोमिन ख़ाँ मोमिन
अर्थ: बुताँ = हसीनों। सारी उम्र हसीनों के इश्क़ में गुज़ार दी, अब आख़िरी वक़्त में क्या पारसा बनेंगे।
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो
— मोमिन ख़ाँ मोमिन
अर्थ: क़रार = वादा। हमारे बीच जो वादा था, साथ निभाने का, पता नहीं तुम्हें अब याद है या नहीं।
नोट: ये रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं और शायर के नाम के साथ दी गई हैं। अर्थ हमारी टीम ने आसान भाषा में लिखे हैं।