अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ानाँ (1556–1627) मुग़ल बादशाह अकबर के दरबार के नवरत्नों में गिने जाते हैं। वो अकबर के सेनापति बैरम ख़ाँ के बेटे थे और ख़ुद भी बड़े सेनापति और विद्वान थे।
रहीम का परिचय
- समय: 1556–1627
- जगह: लाहौर / आगरा
रहीम ने ब्रज और अवधी में दोहे लिखे। उनके दोहे दोस्ती, इज़्ज़त, विनम्रता और ज़िंदगी के व्यवहार पर हैं, और इतने आसान हैं कि लोग उन्हें कहावतों की तरह इस्तेमाल करते हैं।
रहीम की मशहूर शायरी, अर्थ सहित
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय
— रहीम
अर्थ: प्रेम का धागा झटके से मत तोड़ो। टूटने के बाद वो जुड़ता नहीं, और जुड़ भी जाए तो बीच में गाँठ रह जाती है।
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तरवारि
— रहीम
अर्थ: बड़ी चीज़ देखकर छोटी को फेंक मत दो। जहाँ सुई का काम है, वहाँ तलवार क्या करेगी?
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून
— रहीम
अर्थ: यहाँ 'पानी' के तीन अर्थ हैं: मोती की चमक, इंसान की इज़्ज़त और आटे (चून) का पानी। पानी के बिना तीनों बेकार हैं।
नोट: ये रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं और शायर के नाम के साथ दी गई हैं। अर्थ हमारी टीम ने आसान भाषा में लिखे हैं।