संत कबीर 15वीं सदी के भक्ति कवि थे। माना जाता है कि वो काशी (वाराणसी) में एक जुलाहा परिवार में पले-बढ़े। उनके जन्म और मृत्यु की तारीख़ों पर इतिहासकारों में मतभेद है।
संत कबीर का परिचय
- समय: 15वीं सदी
- जगह: काशी (वाराणसी)
कबीर ने दिखावे, अंधविश्वास और ऊँच-नीच पर खुलकर लिखा। उनके दोहे और साखियाँ 'बीजक' में संकलित हैं, और कई पद गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं। आज भी उनके दोहे स्कूलों से लेकर रोज़ की बातचीत तक में बोले जाते हैं।
कबीर की मशहूर शायरी, अर्थ सहित
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय
— संत कबीर
अर्थ: मैं दुनिया में बुराई ढूँढने निकला, कोई बुरा नहीं मिला। जब अपने दिल में झाँका, तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय
— संत कबीर
अर्थ: मोटी किताबें पढ़कर कोई ज्ञानी नहीं बना। जिसने प्रेम के ढाई अक्षर समझ लिए, वही असली ज्ञानी है।
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगा कब
— संत कबीर
अर्थ: जो कल करना है वो आज करो, जो आज करना है वो अभी। पल भर में कुछ भी हो सकता है, फिर कब करोगे?
धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय
— संत कबीर
अर्थ: मन, धीरज रखो, सब कुछ अपने समय पर होता है। माली चाहे सौ घड़े पानी डाले, फल मौसम आने पर ही लगता है।
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय
— संत कबीर
अर्थ: अहंकार छोड़कर ऐसी मीठी बात बोलो, जो सुनने वाले को भी सुकून दे और ख़ुद को भी।
नोट: ये रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं और शायर के नाम के साथ दी गई हैं। अर्थ हमारी टीम ने आसान भाषा में लिखे हैं।