सैयद फ़ज़्ल-उल-हसन 'हसरत' मोहानी (1875–1951) उन्नाव ज़िले के मोहान क़स्बे में पैदा हुए, और उसी क़स्बे के नाम से 'मोहानी' कहलाए।
हसरत मोहानी का परिचय
- समय: 1875–1951
- जगह: मोहान (उन्नाव)
वो आज़ादी की लड़ाई में कई बार जेल गए और संविधान सभा के सदस्य भी रहे। 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' का नारा उन्हीं से जोड़ा जाता है। उनकी ग़ज़ल 'चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है' ग़ुलाम अली की आवाज़ में घर-घर पहुँची।
हसरत की मशहूर शायरी, अर्थ सहित
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
— हसरत मोहानी
अर्थ: चुपके-चुपके रात-दिन रोना आज भी याद है। इश्क़ का वो पुराना ज़माना हमें अब तक नहीं भूला।
नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती
मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं
— हसरत मोहानी
अर्थ: कभी तो महीनों उनकी याद नहीं आती, पर जब आती है तो बार-बार आती है।
तोड़ कर अहद-ए-करम ना-आश्ना हो जाइए
बंदा-परवर जाइए अच्छा ख़फ़ा हो जाइए
— हसरत मोहानी
अर्थ: अहद-ए-करम = मेहरबानी का वादा, ना-आश्ना = अजनबी। वादा तोड़कर अजनबी बन जाइए; ठीक है हुज़ूर, जाइए, नाराज़ हो जाइए।
नोट: ये रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं और शायर के नाम के साथ दी गई हैं। अर्थ हमारी टीम ने आसान भाषा में लिखे हैं।