अली सिकंदर 'जिगर' मुरादाबादी (1890–1960) मुरादाबाद में पैदा हुए। मुशायरों में उनका तरन्नुम (गाकर पढ़ने का अंदाज़) बहुत मशहूर था।
जिगर मुरादाबादी का परिचय
- समय: 1890–1960
- जगह: मुरादाबाद / गोंडा
उनके संग्रह 'आतिश-ए-गुल' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। इश्क़, मस्ती और इंसानियत उनकी शायरी के रंग हैं। उनका इंतक़ाल गोंडा (उत्तर प्रदेश) में हुआ।
जिगर की मशहूर शायरी, अर्थ सहित
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है
— जिगर मुरादाबादी
अर्थ: इश्क़ आसान नहीं, ये आग की नदी जैसा है, और उसे पार नहीं करना, उसमें डूबकर जाना है।
हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
— जिगर मुरादाबादी
अर्थ: दुनिया में इतना दम नहीं कि हमें मिटा दे। ज़माना हमसे बनता है, हम ज़माने से नहीं।
उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें
मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे
— जिगर मुरादाबादी
अर्थ: अहल-ए-सियासत = राजनीति वाले। उनका फ़र्ज़ वो जानें, मेरा संदेश तो बस मोहब्बत है, जहाँ तक पहुँच सके।
नोट: ये रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं और शायर के नाम के साथ दी गई हैं। अर्थ हमारी टीम ने आसान भाषा में लिखे हैं।