मीर तक़ी मीर (1723–1810) का जन्म आगरा में हुआ। जवानी में वो दिल्ली आए और वहीं उनकी शायरी परवान चढ़ी। दिल्ली पर हमलों और बदहाली के बाद वो 1782 में लखनऊ चले गए, जहाँ उन्होंने ज़िंदगी के आख़िरी साल बिताए।
मीर तक़ी मीर का परिचय
- समय: 1723–1810
- जगह: आगरा / दिल्ली / लखनऊ
मीर को उर्दू ग़ज़ल के सबसे बड़े शायरों में गिना जाता है। उनकी ज़बान आसान है, पर उसमें दर्द और इश्क़ की गहराई बहुत है। बाद के शायर, ग़ालिब तक, उन्हें उस्ताद मानते थे। उनके छह दीवान हैं।
मीर की मशहूर शायरी, अर्थ सहित
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
— मीर तक़ी मीर
अर्थ: बाग़ का हर पत्ता और हर पौधा मेरा हाल जानता है। अगर कोई नहीं जानता तो बस वो फूल (महबूब), बाक़ी पूरा बाग़ जानता है।
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
— मीर तक़ी मीर
अर्थ: महबूब के होंठों की नज़ाकत का क्या बयान करें, वो गुलाब की एक पंखुड़ी जैसे हैं।
इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या
— मीर तक़ी मीर
अर्थ: इब्तिदा = शुरुआत। अभी तो इश्क़ की शुरुआत है, अभी से क्यों रोता है? आगे देखो क्या-क्या होता है।
'मीर' क्या सादे हैं बीमार हुए जिस के सबब
उसी अत्तार के लड़के से दवा लेते हैं
— मीर तक़ी मीर
अर्थ: सादे = भोले। अत्तार = दवा/इत्र बेचने वाला। मीर कितने भोले हैं, जिसकी वजह से बीमार (इश्क़ में) हुए, उसी से दवा माँग रहे हैं।
नोट: ये रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं और शायर के नाम के साथ दी गई हैं। अर्थ हमारी टीम ने आसान भाषा में लिखे हैं।