Akbar Allahabadi Shayari: अकबर इलाहाबादी के शेर, अर्थ सहित

सैयद अकबर हुसैन रिज़वी 'अकबर' इलाहाबादी (1846–1921) इलाहाबाद के पास पैदा हुए। उन्होंने वकालत की और आगे चलकर सेशन जज बने।

अकबर इलाहाबादी का परिचय

  • समय: 1846–1921
  • जगह: इलाहाबाद (प्रयागराज)

अकबर उर्दू में तंज़-ओ-मिज़ाह (व्यंग्य और हास्य) के सबसे बड़े शायरों में गिने जाते हैं। अंग्रेज़ी राज, नई तालीम और दिखावे पर उनके शेर आज भी उतने ही ताज़ा लगते हैं।

अकबर की मशहूर शायरी, अर्थ सहित

हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

— अकबर इलाहाबादी

अर्थ: हम ज़रा-सी आह भी भरें तो बदनाम हो जाते हैं, और वो क़त्ल भी कर दें तो कोई बात तक नहीं करता।

खींचो न कमानों को न तलवार निकालो
जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो

— अकबर इलाहाबादी

अर्थ: मुक़ाबिल = सामने। जब सामने ताक़तवर (तोप) हो, तो तीर-तलवार नहीं, अख़बार यानी क़लम और आवाज़ से लड़ो।

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ
बाज़ार से गुज़रा हूँ ख़रीदार नहीं हूँ

— अकबर इलाहाबादी

अर्थ: तलबगार = चाहने वाला। मैं दुनिया में रहता हूँ पर उसका लालची नहीं। बाज़ार से गुज़रता हूँ, पर कुछ ख़रीदने की चाह नहीं।

नोट: ये रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं और शायर के नाम के साथ दी गई हैं। अर्थ हमारी टीम ने आसान भाषा में लिखे हैं।

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