असरार-उल-हक़ 'मजाज़' (1911–1955) बाराबंकी ज़िले के रुदौली में पैदा हुए और अलीगढ़ में पढ़े। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का तराना 'ये मेरा चमन है मेरा चमन' उन्हीं की रचना है।
मजाज़ लखनवी का परिचय
- समय: 1911–1955
- जगह: रुदौली / लखनऊ
वो तरक़्क़ी-पसंद तहरीक (प्रगतिशील आंदोलन) के अहम शायर थे और रूमानी अंदाज़ की वजह से 'उर्दू का कीट्स' कहलाए। कम उम्र में लखनऊ में उनका इंतक़ाल हुआ।
मजाज़ की मशहूर शायरी, अर्थ सहित
तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
— मजाज़ लखनवी
अर्थ: परचम = झंडा। तेरे माथे पर आँचल सुंदर है, पर अच्छा होता अगर तू इसी आँचल को अपने हक़ की लड़ाई का झंडा बना लेती।
कुछ तुम्हारी निगाह काफ़िर थी
कुछ मुझे भी ख़राब होना था
— मजाज़ लखनवी
अर्थ: काफ़िर निगाह = दिल लूट लेने वाली नज़र। कुछ तुम्हारी नज़र ही ऐसी थी, और कुछ मेरी क़िस्मत में भी बिगड़ना लिखा था।
नोट: ये रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं और शायर के नाम के साथ दी गई हैं। अर्थ हमारी टीम ने आसान भाषा में लिखे हैं।