शौकत अली ख़ाँ 'फ़ानी' बदायूँनी (1879–1941) बदायूँ में पैदा हुए। उन्होंने वकालत की, पर मन शायरी में ही लगा। आख़िरी बरस उन्होंने हैदराबाद में बिताए।
फ़ानी बदायूँनी का परिचय
- समय: 1879–1941
- जगह: बदायूँ / हैदराबाद
'फ़ानी' का अर्थ ही है 'मिट जाने वाला'। उनकी शायरी का रंग उदासी, जुदाई और ज़िंदगी की नश्वरता है, इसलिए उन्हें 'यासियात का इमाम' (उदासी का उस्ताद) भी कहा जाता है।
फ़ानी की मशहूर शायरी, अर्थ सहित
इक मुअम्मा है समझने का न समझाने का
ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का
— फ़ानी बदायूँनी
अर्थ: मुअम्मा = पहेली। ज़िंदगी एक ऐसी पहेली है जिसे न समझा जा सकता है न समझाया। ये किसी दीवाने का ख़्वाब है।
मौत का इंतिज़ार बाक़ी है
आप का इंतिज़ार था न रहा
— फ़ानी बदायूँनी
अर्थ: आपका इंतज़ार था, वो अब ख़त्म हो गया। अब बस मौत का इंतज़ार बाक़ी है।
नोट: ये रचनाएँ पब्लिक डोमेन में हैं और शायर के नाम के साथ दी गई हैं। अर्थ हमारी टीम ने आसान भाषा में लिखे हैं।