उर्दू और हिंदी के उन उस्ताद शायरों और कवियों से मिलिए, जिनकी शायरी सदियों बाद भी ज़बान पर है। हर शायर का छोटा परिचय, उनका एक मशहूर शेर, और पूरी शायरी आसान अर्थ के साथ।

मिर्ज़ा ग़ालिब
1797–1869 · आगरा / दिल्लीउर्दू और फ़ारसी के सबसे बड़े शायरों में से एक। असली नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ाँ। आगरा में पैदा हुए, ज़िंदगी का ज़्यादातर हिस्सा दिल्ली में बीता।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या हैग़ालिब की पूरी शायरी →
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

मीर तक़ी मीर
1723–1810 · आगरा / दिल्ली / लखनऊउर्दू ग़ज़ल के उस्ताद, जिन्हें 'ख़ुदा-ए-सुख़न' (शायरी का ख़ुदा) कहा जाता है। सादी ज़बान में गहरा दर्द।
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने हैमीर की पूरी शायरी →
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

संत कबीर
15वीं सदी · काशी (वाराणसी)भक्ति काल के संत और कवि। उनके दोहे सीधी भाषा में ज़िंदगी, प्रेम और इंसानियत की बात करते हैं।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोयकबीर की पूरी शायरी →
जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय

रहीम
1556–1627 · लाहौर / आगराअकबर के नवरत्नों में से एक, अब्दुल रहीम ख़ान-ए-ख़ानाँ। उनके नीति के दोहे आज भी कहावतों की तरह बोले जाते हैं।
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकायरहीम की पूरी शायरी →
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
1790–1854 · दिल्लीमुग़ल दरबार के मलिक-उश-शुअरा (राजकवि) और बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद। ग़ालिब के समकालीन।
अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगेज़ौक़ की पूरी शायरी →
मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएँगे

मोमिन ख़ाँ मोमिन
1800–1851 · दिल्लीदिल्ली के शायर, हकीम और ज्योतिषी। उनके एक शेर पर ग़ालिब ने अपना पूरा दीवान देने की बात कही थी, ऐसा मशहूर है।
तुम मिरे पास होते हो गोयामोमिन की पूरी शायरी →
जब कोई दूसरा नहीं होता
दाग़ देहलवी
1831–1905 · दिल्ली / हैदराबादज़ौक़ के शागिर्द और अल्लामा इक़बाल के उस्ताद। हैदराबाद के निज़ाम के दरबारी शायर। सादी, चुलबुली ज़बान के लिए मशहूर।
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का थादाग़ की पूरी शायरी →
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था

अल्लामा इक़बाल
1877–1938 · सियालकोट / लाहौर'सारे जहाँ से अच्छा' के रचयिता। ख़ुदी (आत्मसम्मान) और हौसले की शायरी के लिए मशहूर, दाग़ देहलवी के शागिर्द।
सितारों से आगे जहाँ और भी हैंइक़बाल की पूरी शायरी →
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं

अकबर इलाहाबादी
1846–1921 · इलाहाबाद (प्रयागराज)पेशे से जज, शौक़ से व्यंग्यकार। अंग्रेज़ी राज और बदलते समाज पर हँसी-हँसी में तीखी बात कहने वाले शायर।
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनामअकबर की पूरी शायरी →
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता

हसरत मोहानी
1875–1951 · मोहान (उन्नाव)शायर और स्वतंत्रता सेनानी। 'चुपके चुपके रात दिन' के शायर, और 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' नारा देने वालों में गिने जाते हैं।
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद हैहसरत की पूरी शायरी →
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
फ़ानी बदायूँनी
1879–1941 · बदायूँ / हैदराबादउर्दू में दर्द और उदासी के शायर। ज़िंदगी और मौत पर उनके शेर गहरे और यादगार हैं।
इक मुअम्मा है समझने का न समझाने काफ़ानी की पूरी शायरी →
ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का

जिगर मुरादाबादी
1890–1960 · मुरादाबाद / गोंडाइश्क़ और मस्ती के शायर। 'ये इश्क़ नहीं आसाँ' उन्हीं का शेर है। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित।
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजेजिगर की पूरी शायरी →
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है
मजाज़ लखनवी
1911–1955 · रुदौली / लखनऊतरक़्क़ी-पसंद (प्रगतिशील) शायर, जिन्हें 'उर्दू का कीट्स' कहा गया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का तराना उन्हीं का लिखा है।
तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिनमजाज़ की पूरी शायरी →
तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था
सिर्फ़ पब्लिक डोमेन शायर क्यों?
हम सिर्फ़ उन्हीं शायरों की रचनाएँ यहाँ देते हैं जिनकी शायरी अब भारत में कॉपीराइट से बाहर (पब्लिक डोमेन, शायर के निधन के 60 साल बाद) है, और हमेशा उनके नाम के साथ। आज के शायरों की रचनाएँ उनकी किताबों और आधिकारिक स्रोतों पर पढ़िए। हमारी ओरिजिनल शायरी के लिए प्यार शायरी और इमेज शायरी देखें।
चित्र: Wikimedia Commons से पब्लिक डोमेन चित्र; हसरत मोहानी का चित्र: India Post डाक टिकट (2014), GODL-India लाइसेंस। जिन शायरों का भरोसेमंद पब्लिक डोमेन चित्र नहीं मिला, उनके लिए नाम का पहला अक्षर दिखाया गया है।